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मनोज कुमार(MDCA सचिव )

पटना 30 अक्टूबर : अजब है बीसीए इसकी गजब कहानी इस कड़ी में आपको हम वाकिफ कराते हैं बिहार क्रिकेट संघ के अध्यक्ष राकेश कुमार तिवारी के कारनामों से । श्री तिवारी ने जब से बीसीए का नेतृत्व संभाला है शायद ही वह दिन होगा जिसमें उन्होंने अपने हितों का ख्याल ना रखा हो और बीसीए अध्यक्ष की हैसियत से आये दिन ऐसे फैसले किया हो जो बीसीए के संविधान के विरुद्ध तो रहा ही, उन फैसलों ने बीसीए से लेकर जिला संघो को भी परेशानी में डाल रखा है।


निर्वाचन के बाद बीसीसीआई के एजीएम में कैसे इनकी सहभागिता हो इसकी चिंता करते हुए बगैर सी ओ एम की सहमति मुंबई तक पहुंच गये थे। हालांकि तब बाद में बीसीए की प्रतिष्ठा को देखते हुए सी ओ एम के सदस्यों ने इन्हें आम सभा में बैठने हेतु आवश्यक पत्र लिख दिया था। आगे भी श्री तिवारी बीसीसीआई में अपनी पैठ बनाने हेतु सीओएमके सदस्यों की आँखों में धूल झोंकते रहे ।इसका बड़ा प्रमाण मौजूदा परिस्थिति में बीसीए के संयुक्त सचिव कुमार अरविंद को कार्यकारी सचिव की हैसियत से दुबई में आयोजित होने वाली आईपीएल के खिताबी मुकाबले में बीसीए की ओर से सहभागिता का दिलासा रहा ।

अपने तमाम संविधान विरोधी कार्यो में संयुक्त सचिव को सहभागी बनाने वाले बीसीए अध्यक्ष ने उन्हें यह दिलासा दिलाया कि भले ही बीसीसीआई ने आईपीएल के फाइनल में अतिथि के रूप में सहभागी बनने वाले राज्यों की सूची में बिहार का नाम नहीं रखा हो लेकिन उनके पास जो तरकीब है उससे संयुक्त सचिव दुबई का टिकट कटा सकेंगे ।अब इसे उनकी नासमझी कहिए , नादानी कहिए या अधिक ऊर्जावान बनना कि बीसीसीआई के निर्देशों के उलट बीसीए अध्यक्ष ने सी ई ओ मनीष राज से कमेटी ऑफ मैनेजमेंट के तमाम सदस्यों को एक पत्र जारी कराया। उक्त पत्र में सदस्यों को कुमार अरविंद के पक्ष में सहमति जताने का निर्देश दिया गया था जबकि विधिवत इसके लिए कमेटी ऑफ मैनेजमेंट की बैठक होनी चाहिए थी ।

बीसीए सीईओ द्वारा भेजे गए ईमेल

बैठक में रायशुमारी होकर तय होता कि दुबई में आईपीएल के फाइनल में बीसीए का प्रतिनिधित्व कौन करेगा । यहाँ सबसे बड़ी बात यह है कि जब बीसीसीआई ने दुबई मामले में बीसीए को काली सूची में डाल रखा था और आमंत्रित सदस्य राज्य को टिकट व वीजा भेजे जा चुके हैं फिर यह पैंतरेबाजी क्यों? हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब अध्यक्ष राकेश तिवारी ने संयुक्त सचिव को झूठा दिलासा दिया हो या झांसे में रखा हो । पूर्व में भी उन्हें बीसीए का पूर्णकालिक सचिव बनाने का लॉलीपॉप दिखाकर वैसे तमाम गैर संवैधानिक कार्यों में हस्ताक्षरी बनाया गया अथवा सहभागी बनाया गया है जिसमें आने वाले दिनों में संभवत संयुक्त सचिव भी कानूनी गिरफ्त में फंस सकते हैं।

बीसीए की लोकपाल, सीईओ, सीओएम सदस्यों के निजी सचिव के मानदेय भुगतान, जिलों को बगैर किसी व्यय के लाखों की राशि का आवंटन, कार्यालय के साथ अतिथि भवन का किराया भुगतान आदि संदिग्ध मामले हैं। बीसीए सूत्र की माने तो बहुत जल्द बीसीसीआई से तीन सदस्यीय कमेटी बीसीए में उत्पन्न विवाद , गतिरोध और तथाकथित वित्तीय अनियमितता मामले की जांच को आने वाली है।अगर यह टीम आती है तो कहने में अतिशयोक्ति नहीं है कि पिछले नौ दस महीनों में जिस तरीके से बीसीए अध्यक्ष के निर्देशानुसार बीसीसीआई से अनुदानित फंड का कथित बंदरबांट किया गया है निश्चय ही इस मामले में जांचोपरांत बीसीसीआई की टीम स्वत : संज्ञान ले सकती है और ऐसे मामले में अनुदानित राशि के दुरुपयोग का मामला कानूनी रंग रूप भी ले सकता है।